मी कसे शब्द
थोपवू माझे?
हिंडती सूर
आसपास किती!
(सुरेश भट)
आपण असतो आपली धून, गात रहा
आपण असतो आपला पाऊस, न्हात रहा
(मंगेश पाडगावकर)
कवितेऐवजी
रद्दी विकली असती
तर बरे झाले असते
निदान देणेकर्यांचे
तगादे तरी
चुकवता आले असते...
(नारायण सुर्वे)
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